Wednesday, March 08, 2006

यह क्या बला है?

नून तेल लकडी !!

शाब्दिक अर्थों में समझें तो - नमक, तेल और लकडी। जिन्दगी गुजारने के अतिमहत्वपूर्ण साधन। जिनके बिना किसी का गुजारा नही चलता। जिसके लिये इंसान हर तरह के काम करता है, मेहनत करता है, अच्छे बुरे काम करता है, ताकि भूख मिट सके, ठौर ठिकाना हो सके।

यह "नून तेल लकडी" ही है, जो हर तरह के खेल खिलाती है, जगह जगह भटकाती है, नई नई दुनिया दिखाती है, नये लोगों से मिलवाती है, वहीं अपनों से बिछडवाती भी है। मगर कुछ पाने की ख्वाहिश ही सारे गमों को दरकिनार करते हुये आगे बढने की आग बरकरार रखते हुये चलते रहने का हौसला देती है।

जीवन यापन की जुगाड में लगे हुये भी हम उसमें कहीं ना कहीं, कुछ ना कुछ, किसी ना किसी तरह से मुस्कुराने के बहाने ढुंढ ही लेते हैं. नये लोगों से मुलाकात, उनके विचार, नई जगह पर झेली हुई परेशानी, और उस परेशानी से बाहर आने की कथा-व्यथा, याने कि एक नये ब्लाग की उत्पत्ति के लिये पर्याप्त "मटेरीयल"!!

वही "मटेरीयल" (या संस्मरण) आप सबके साथ बाँटना चाहता हूँ। हो सकता है कि इसमें आपको अपनी खुद की ही कहानी मिले। नये पात्रों के साथ, नये "सेट्स" पर!! मगर कहानी वही, आपकी अपनी- नून तेल लकडी की.

5 comments:

पंकज बेंगाणी said...

दार्शनिक अन्दाज़ अच्छा है

रवि रतलामी said...

आप मेरी तरह के दूसरे हैं जिन्हें सचमुच जिम्मेदार माना जाता है...

हिन्दी चिट्ठा जगत् में आपका स्वागत् है.

रवि रतलामी said...

आप मेरी तरह के दूसरे हैं जिन्हें सचमुच जिम्मेदार माना जाता है...

हिन्दी चिट्ठा जगत् में आपका स्वागत् है.

अनुनाद सिंह said...

गुरुदेव ! ब्लाग का नाम पढकर तो आप " ग्रास रूट इकोनामिस्ट " लगते हैं | हिन्दी जगत को आप की महान आवश्यकता है |

स्वागतम् !


अनुनाद

Jitendra Chaudhary said...

बाकी तो सब ठीक है, इस नून(Noon) में तेल और लकड़ी की क्या जरुरत। अभी तो कुंवारे को काहे पड़ गये इत्ती जल्दी से इन चक्करों में। खैर अब पड़ ही गये हो तो लिखो, कमेन्ट और खिंचाई के लिये तो हम हैईये ही।